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May 21, 2024
CHINA EXPOSED
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दोस्तों आज हम जिस देश के बारे में आपको बताने जा रहे हैं उस देश का इतिहास हमेशा ही अपनी कुटिल नीतियों क्रूर बर्ताव तथा सीमाओं का विस्तार के लिए जाना जाता रहा है|
आज हम जिस देश के बारे में बात कर रहे हैं वहऔर कोई देश नहीं बल्कि हमारा पड़ोसी देश चाइना और चीन है, जिसकी कुटिल और क्रूर नीतियों का शिकार हमेशा हमारा देश भारत और अब भारत के साथ-साथ दुनिया के तमाम देश इस देश की गंदी राजनीति का शिकार बन चुके हैं|
यह सब पढ़ने के बाद आपके दिमाग में है आ रहा होगा सभी देश चीन के साथ में अपने संबंध खत्म क्यों नहीं कर लेते हैं, दोस्तों इस बारे में भी अब अनेक देश सोचने लगे हैं और इन देशों के लाइन में सबसे पहला नाम आता है ऑस्ट्रेलिया| ऑस्ट्रेलिया में बहुत समय से इस पर विचार किया जा रहा है कि हम कैसे China के ऊपर से अपनी निर्भरता को दूर कर सकते हैं?

इसी तरह देखा जाए तो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में चाइना के खिलाफ ट्रेड वॉर का एलान किया था, ट्रेड वॉर के इस ऐलान में अमेरिकी राष्ट्रपति का ना सिर्फ उनकी पार्टी ने साथ दिया बल्कि उनकी विपक्षी पार्टी ने भी इसका जमकर साथ दिया |

अब हम आपको यह बताते हैं की डोनाल्ड ट्रंप के इस ट्रेड वार का मतलब क्या था, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा चाइना से जो माल अमेरिका में इंपोर्ट किया जाता है उस पर एक बड़ा भारी टैक्स लगा दिया जाए जिससे उस माल की कीमत अमेरिकी माल की तुलना में बढ़ जाएगी और इस बड़े हुए माल को जा हम यूं कहें कि वहां से लिए गए सामान की कीमत बढ़ जाएगी और इस वजह से अमेरिका के लोग बड़े हुए सामान के बदले सस्ता सामान लेने की ओर अपना रुख कर लेंगे

ट्रंप सरकार ने यह वार स्टार्ट तो कर दिया इसका बहुत बड़ा खामियाजा अमेरिकी सरकार को भी उठाना पड़ा क्योंकि जवाब में चाइना ने भी अमेरिका से जो सामान इंपोर्ट किया जाता था उस पर चाइना में टैरिफ बढ़ा दिया गया और जिसकी वजह से इस सामान की कीमत अधिक होने से चाइना के लोगों ने इस सामान को खरीदने से नकार दिया| यह जो अभी आपको हमने बताया जिसमें दोनों ही देशों ने अपने अपने देशों में दूसरे देश से आए हुए सामान पर टैरिफ बढ़ाया इसी को ही ट्रेड वॉर कहा गया|

एक रिपोर्ट के मुताबिक स्ट्रेटबॉल की वजह से दोनों ही देशों की जीडीपी पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा जहां चाइना की जीडीपी 1% से घट गई वही अमेरिकी जीडीपी भी .9% से घट गई| अमेरिका में सबसे ज्यादा फर्क पड़ा या हम यूं कहे सबसे ज्यादा नुकसान हुआ वहां के किसानों को जो चाइना में एक्सपोर्ट करने के वास्ते सोयाबीन की फसल उगाया करते थे तथा सोयाबीन तेल एक्सपोर्ट किया करते थे|
ऐसा नहीं था कि डोनाल्ड ट्रंप सरकार को इसके खामियाजा भुगतने का पता नहीं था लेकिन फिर भी वह चाइना को यह दिखाना चाहते थे कि वह अपनी नीतियां सुधारें और अमेरिका चाइना पर से अपनी डिपेंडेंसी को कम करें| इस वार के परिणाम स्वरूप अमेरिका के दोनों मकसद सिद्ध हुए और चाइना ने 2020 में एलान किया कि वह अपनी करंसी मैनिपुलेशन को बंद कर देगा चाइना ने यह भी माना कि अब से वह जो भी बाहरी कंपनियां वहां निवेश के लिए आती है उन पर उनकी टेक्नोलॉजी शेयरिंग का दबाव नहीं बनाएगा| इस तरह की काफी सारे अनुबंधों के मान लेने पर अमेरिका ने चीन के साथ हुए ट्रेड वॉर को खत्म किया|

ट्रेड वॉर का एक दूसरा असर यह हुआ कि चाइना ने चाइना में उपस्थित कुछ अमेरिकी कंपनियों को कहा कि वह अपनी कंपनियां चाइना से हटाकर किसी दूसरे देश में स्थापित कर ले यह कुछ कंपनियां वही कंपनियां थी जो पहले खुद चाहती थी कि वह चाइना से हटकर किसी दूसरे देश में अपना व्यापार शुरू करें पर चाइना के नीतियों के तले वह वहां से निकल नहीं पा रही थी| इस तरह कंपनियों के चाइना से निकल जाने की वजह से अमेरिका की चाइना से निर्भरता और भी कम हो गई|

इस ट्रेड वॉर का सबसे अधिक फायदा वियतनाम को हुआ क्योंकि वियतनाम में भी वह सभी आइटम बनाए जाते थे जो अन्य देशों को चाइना से लेने पड़ते थे| परंतु अब चाइना ने खुद के पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारते हुए अन्य देशों को वियतनाम से यह आइटम लेने के लिए स्वतंत्र कर दिया| वियतनाम के अलावा ताइवान नीदरलैंड इटली जैसे तमाम देशों को भी इसका काफी फायदा हुआ और जिसकी वजह से उनकी जीडीपी पर भी इसका काफी अच्छा प्रभाव दिखा|
इस पूरी ट्रेड वार को बताने के पीछे मेरा मकसद यही था कि मैं आपको यह बता सकूं कि कितना आसान है चाइना को और चाइना पर अन्य देशों की निर्भरता को कम करना पर इसका प्रभाव हमारे देश भारत पर इतना विपरीत पड़ेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था को इसका बहुत भारी मूल्य अदा करना पड़ेगा और इसकी वजह यह है कि भारत यह सब करने के लिए अभी पूर्णत सक्षम नहीं है क्योंकि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होना लाजमी है और भारत के पास उस प्रतिक्रिया का कोई ठोस जवाब नहीं है|

एक आंकड़े के मुताबिक 2018-19 मे चाइना से जो सामान भारत में एक्सपोर्ट किया गया उसकी कीमत लगभग 70 बिलियन डॉलर थी वही भारत में जो सामान चाइना के लिए एक्सपोर्ट किया गया उसकी कीमत मात्र 16.5 बिलियन डॉलर के लगभग थी इस डाटा से आपको यह पता लग रहा होगा इंडिया की चाइना पर निर्भरता काफी अधिक है| चाइना पर भारत की सबसे अधिक निर्भरता इलेक्ट्रॉनिक आइटम जैसे स्मार्टफोन टीवी अन्य कंप्यूटर उपकरण पर रही है| स्मार्टफोन की बात करें तो लगभग 76% स्मार्टफोन हम चाइना से खरीदते हैं उसके बाद 65-70% दवाइयां हमारी चाइना से ही आती है और भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं दिल पर हम चाइना पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं| तो अगर हमें चाइना से अपनी निर्भरता को कम करना है तो सबसे पहले इन क्षेत्रों से अपनी निर्भरता को कम करना होगा| हम एकदम से तो सब कुछ खत्म नहीं कर सकते या कहे की बाईकाट नहीं कर सकते पर उस सामान को किसी अन्य सामान से रिप्लेस किया जा सकता है|
सबसे पहले हम बात करते हैं इंडिविजुअल लेवल पर मतलब कि एक व्यक्ति के द्वारा क्या किया जा सकता है?

कुछ चीजों में बाईकाट करना बहुत आसान है हम जो हमारे मोबाइल फोन में चाइनीस सॉफ्टवेयर यूज करते हैं उनको हटाकर हम हमारे देश में निर्मित सॉफ्टवेयर्स कभी यूज कर सकते हैं लेकिन इस कार्य में सरकार का भी सहयोग अपेक्षित है सरकार लोगों को इस और कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करें और मार्केट में आ रहे चाइनीस प्रोडक्ट का उपयोग कम से कम करने की ओर जनता का ध्यान दिलाएं|
सॉफ्टवेयर के बाद अब अगर हम हार्डवेयर प्रोडक्ट पर आएं तो हमारे द्वारा खरीदे गए मोबाइल टीवी लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान को हम अपने देश भारत में निर्मित इलेक्ट्रॉनिक सामान का ही उपयोग करें, हां यह कहना मुश्किल नहीं होगा की भारत में उत्पादित इलेक्ट्रॉनिक सामान चाइना से आयातित सामान से महंगे होंगे लेकिन हमें इस बात के लिए सोचना चाहिए कि आखिर इस कार्य को करने के बाद हमारा पैसा हमारे देश में ही रहेगा और चाइना पर से हमारी इलेक्ट्रॉनिक सामान की निर्भरता में कुछ कमी आएगी; हम ऐसा भी नहीं कह रहे हैं कि आपके पास जो अभी चाइनीस स्मार्टफोन है आप उसे फेंक दें बल्कि अब जब भी आपको कोई नया स्मार्टफोन खरीदना हो तो आप स्वदेशी स्मार्टफोन ही खरीदें|

अब हम बात करते हैं कुछ ऐसे भारतीय स्टार्ट अप की जो दिखने में तो भारतीय हैं और उनका मूल भी भारत से ही शुरू हुआ है परंतु उनमें कहीं ना कहीं अन्य देशों की भी हिस्सेदारी है, इसमें कुछ कंपनियां ऐसी है जिनमें चाइना हिस्सेदारी बहुत कम और कुछ ऐसी है जिनमें हिस्सेदारी बहुत अधिक, उदाहरण के लिए मैं आपको समझाऊं कि यदि कोई कंपनी जिसमें चाइना की हिस्सेदारी 10 से 20% हो तो उससे चाइना को कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला वहीं अगर कोई कंपनी ऐसी हो जिसमें चाइना के हिस्सेदारी 40 से 50% या उससे अधिक हो तो ऐसे कंपनियों के सामान या उनके द्वारा दी गई सुविधा लेने से पहले हमें सोचना चाहिए|

चाइना के प्रोडक्ट को बाईकाट करने के इस श्रंखला में कुछ लोग कहते हैं कि चाइनीस फूड को भी बाईकाट किया जाना चाहिए, पर यह सब फालतू की बेतुकी बातें हैं क्योंकि ऐसा करने से हम अपने देश में फूड इंडस्ट्री को ही हानि पहुंचाते हैं, आप खुद सोच कर देखिए इन चाइनीस फूड कंपनियों में काम करने वाले और काम आने वाले प्रोडक्ट तो भारतीय ही है तो फिर फूड को बाईकाट करने से हम उन लोगों की कमाई पर भी हानि पहुंचा रहे हैं|
अगर हम बिजनेस और कंपनी के लेवल पर बात करें कि वह चाइना को और चाइना से उत्पादित सामान को किस तरह बाईकाट कर सकते हैं तो दुकानदारों को अपनी दुकान के बाहर इस तरीके के बैनर लगाए जाने चाहिए कि यहां पर चाइनीस सामान नहीं मिलता है, कंपनियां भी कुछ इस तरह के प्रोडक्ट बनाएं जो अधिक महंगे ना हो जिससे उपभोक्ता उन पर जाने की सोचे,इसके बाद अगर कोई कुछ कर सकता है तो वह हमारी सरकार|
सरकार को दूसरे देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट बनवाए जाने चाहिए, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होता है दो देशों के बीच आसानी से कम से कम टैक्स के बीच उत्पाद का आदान प्रदान करना जिससे कि किसी देश के ऊपर टैक्स की वजह से मूल्य पर अधिक भार ना पड़े, अगर हम चाहते हैं कि भारत की चाइना पर से निर्भरता कम हो तो हमें और देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन करनी चाहिए जिससे हम हमारा और दूसरे देशों का उत्पादक सामान आसानी से एक दूसरे को भेज सकें और उत्पादक वस्तुओं का मूल्य अधिक ना बढ़ पाए| अन्य देश इस ट्रेड एग्रीमेंट का फायदा उठाकर आगे बढ़ रहे हैं और अपनी जीडीपी में सहयोग कर रहे हैं भारत को भी इस ओर कदम उठाना चाहिए इस तरह के एग्रीमेंट जल्द से जल्द सभी देशों के साथ किए जाने चाहिए|

आज के लिए हमारी तरफ से इतना ही आशा है आपको हमारी यह जानकारी पसंद आई होगी, आने वाली अन्य जानकारियों के लिए आप हमारे चैनल(INSIDE PRESS INDIA) को सब्सक्राइब करें और नई नई जानकारियां प्राप्त करते रहें|

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One thought on “CHINA Exposed!!-Explainer about CHINA’S devious foreign policies

  1. […] भारत ने एक-चीन नीति का पालन किया, लेकिन वर्ष 2010 के दौरान, भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री, डॉ मनमोहन सिंह ने तत्कालीन चीनी प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान एक-चीन नीति के लिए कोई समर्थन व्यक्त नहीं किया। बाद में वर्ष 2014 में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए ताइवान के राजदूत चुंग क्वांग टीएन और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष लोबसंग सांगे को आमंत्रित किया। […]

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